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प्रकृति और हम : विरोध-आभास


प्रकृति और हम : विरोध-आभास 

ब्रह्मसरोवर कुरुक्षेत्र - एक मनोरम दृश्य ! शाम के समय गया यह यहा चित्र बेहद सुंदर है - यह देखने वाले के मन पर निर्भर करता है - जिस तरह से प्रकृति ने अपने सौंदर्य को इतने गहरे रंग देकर भी , कुछ भी तो मांग नहीं  रही - यही यदि कोई चित्रकार की अभिव्यक्ति होती तो , मनुष्य का अहम साथ जन्म ले चुका होता , यह मेरी चित्रकारी है । इस तरह का अभिमान से कई गुना महान  एक चित्रकार या कलाकार में समर्पण का भाव होता है , बस जैसे की प्रकृति सा । जब यह भाव समाप्त हो कर “मैं” का भाव उत्पन्न होता है तो , बहुत कुछ पीछे छूट जाता है । इतने रंग उकेरे हैं- इस प्रकृति नें, वाह ! फिर भी कोई अहम नहीं , कुछ नहीं । मनुष्य के अंदर सब कुछ , मैंने किया , मैंने बनाया। और भी न जाने क्या , क्या ? इस धरा ने बस दिया है , लिया तो कुछ भी , सबसे पहले श्वास , जिस पर सबसे ज्यादा मनुष्य को घमंड है । यह वह श्वास जो प्रकृति ने बड़े प्यार से इस मानव को उपहार स्वरूप दिये । बदले में मनुष्य ने , प्रकृति को सर्वनाश दिया – जो कभी भी वापिस मनुष्य के पास आ सकता है , थोड़ा –थोड़ा आने लगा है , वापिस । सावधान ! प्रकृति की अनमोल उपहार को एक सुरक्षा प्रदान करें और वातावरण को शुद्ध और स्वच्छ रखें !
आभार सहित – रवीन्द्र रवि

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